इश्क की जादूगरी से . .

इश्क की जादूगरी से यूँ हुई हलचल , सनम
गुल खिला तो उस महक में बह गए दो दिल, सनम ।

बेखबर थे, क्या हुआ, ये जान ही पाए न हम
हमतलक खुद जीस्त की आके खड़ी मंािजल, सनम ।

रुख तेरा देखा , खुशी से साँस यूँ बोझल हुई
नम पलक को लाँघके झाँका यकायक जल, सनम ।

बूँद जमजम की न दे , ना चाहिये आबे हयात
मै मुहब्बत की मिले उस मैकदे में चल, सनम ।

राह में इस , दस्त में है दस्त तेरा , इसलिये
खौफ लम्हे में कयामत का हुआ ओझल, सनम ।

इश्क ही भगवान मेरा, इश्क ही मेरा खुदा
बस यही ख्वाइश , बनूँ मैं इश्क के काबिल, सनम ।

गुल : फूल
जीस्त : जिंदगी, जीवन रुख : चेहरा
नम : गीली जमजम : मक्का का पवित्र कुआँ
आबे हयात : अमृत मै : शराब, मदिरा
मैकदा : मैखाना, मदिरालय दस्त : हाथ
खौफ : डर लम्हा : क्षण, पल

कयामत : महाप्रलय, हश्र का दिन, दुनिया का अन्त

(मेरे एक घनिष्ठ फॅमिली-फ्रेंड/रिश्तेदार की सुपुत्री ने आंतर्-धर्मीय प्रेमविवाह
किया । उस समय की उसकी मनस्थिति क्या रही होगी, इसका चित्र । )

— सुभाष स. नाईक

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