पुरातन भारत और कृषि

जिस तरह मनुष्य को ज़िंदा रहने के लिये हवा ज़रूरी होती है, उसी तरह उसे पानी तथा अन्न की भी आवश्यकता होती है । अन्न का सम्बन्ध अनाज से है, और अनाज का खेती से । तभी तो लालबहादुर शास्त्री जी ने ‘जय जवान’ के साथ साथ ‘जय किसान’ का नारा दिया था । ‘मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती’ जैसे गाने लिक्खे गए, और वे जनगण को अत्यधिक पसंद भी आए । संस्कृत में ‘अन्नदानम् परम्.दानम्’ जैसा सुभाषित सेंकड़ों वर्षों से सुपरिचित है । और वह कहानी तो प्रसिद्ध ही है कि  :  ‘एक कौए को ज़ोरों की भूख लगी ; उसे एक भरी हुई थैली मिली ; उस में अनाज होगा यह सोचकर वह अंदर की चीजों को खाने के हेतु दाँतों से तोड़ने लगा, तो वे रत्न निकले । कौए ने कहा, भूखे को रत्नों का क्या उपयोग ! कुछ अनाज के दाने होते, तो वे मेरे लिये ज़्यादा कीमती होते !’ इसीलिये तो कहावत बनी है, ‘भूखे पेट भजन न होय गोपाला’ । आदमी के लिये अन्न का अनन्यसाधारण महत्व है ।

 

इसी अन्न की ख़ातिर, अति-अति-पुरातन, प्राग्-ऐतिहासिक काल से इन्सान की टोलियाँ ‘हंटर-गैदरर’ (याने कि, शिकार करनेवाले तथा खाने के हेतु फल, बीज, कंद वगैरह  इकट्ठा करनेवाले) इस स्वरूप में जीवनयापन करती थीं । तब मानव-समूह एक जगह स्थित नहीं थे, उन्हें अन्न की खोज में घूमते रहना पड़ता था ।

 

ईसा-से-दस-ग्यारह-हज़ार-वर्ष-पूर्व के काल में, मानव-जीवन में एक बड़ी तब्दीली आई, और इन्सान के पूर्वज ‘पाश्चरल-एग्रिकल्चरल’ (याने कि, जानवर-पालनेवाले तथा खेती- करनेवाले) समाज के रूप में परिवर्तित हो गए । इस का अर्थ यह हुआ कि, दुनिया में खेती का आरम्भ आज से बारह-तेरह हज़ार वर्ष पुराना है । और, जब से पशुपालन तथा कृषि शुरू हुई, तब से बस्तियाँ भी बसने लगीं, धीरे धीरे गाँव तैयार होने लगे, और बाद में नगर ।

 

भारत की भूमि को ‘सु-जलाम् सु-फलाम्’ कहा गया है । आइये, हम ज़रा भारतकी और देखें । इस बात का ख़याल रहे कि, जब हम उस पुरातन-काल के भारत की बात करते हैं, तो उसकी व्याप्ति ‘दक्षिण-एशिया’ (याने की ‘ब्रिटिश कालोनियल-भारत’), तथा साथ ही, आज का अफ़ग़ानिस्तान, यह भूक्षेत्र है।

 

सिंधु-सरस्वती सभ्यता, भारत की पुरातन सभ्यता है । उस के बारे में बात करना आवश्यक है । पुरातन-भारत की सभ्यता का एक बहुत-पुराना स्थल जो मिला है, वह है बलुचिस्तान में मेहेरगढ़ । मेहेरगढ़ के उत्खनन में जो सभ्यता प्राप्त हुई है, उस का काल है ईसा-पूर्व ७५०० वर्ष । हरियाणा में भिराना तथा राखीगढ़ी में (आई. आई. टी. खरगपुर तथा भारत सरकार के पुरातत्व विभाग द्वारा) हाल ही में जो उत्खनन हुआ है, उससे पता चलता है कि सिंधु-सरस्वती सभ्यता का समय ईसापूर्व ८००० वर्ष यह है, न कि ईसा-पूर्व ३५०० या ५५०० वर्ष, जैसा कि पहले सोचा गया था । याने, यह भारतीय सभ्यता मिस्र की सभ्यता से भी प्राचीन है । आज से १०,००० वर्ष पूर्व के उस पुरातन-काल से, भारत में बस्तियों वाली-ग्रामों वाली, पशुपालन वाली, कृषि वाली, और बाद में नगरों वाली, सभ्यता नज़र आती ही है।

 

सिंधु-सरस्वती सभ्यता की लिपि अबतक पढ़ी नहीं जा सकी है । यद्यपि उत्खनन में यज्ञ-वेदियाँ मिली हैं, फिर भी हम यह नि:संदेह कह नहीं सकते कि वह, वैदिक सभ्यताही थी। इसलिये बेहतर यह होगा कि, हम सिंधु-सरस्वती सभ्यता तथा वैदिक सभ्यता दोनों ही पर कृषि की दृष्टि से नज़र डालें ।

 

सिंधु-सरस्वती सभ्यता का पहला स्थल जो प्राप्त हुआ था, वह था पश्चिम-पंजाब में हड़प्पा । अत: यह सभ्यता ‘हड़प्पीय सभ्यता भी कहलाती है । इस के कुछ ही वर्ष बाद सिंध में मोहेन-जो-दारो प्राप्त हुआ । आज हड़प्पा तथा मोहेनजोदारो पाकिस्तान में हैं। पाकिस्तान में इस सभ्यता के बहुत सारे नए नए स्थान प्राप्त हुए हैं ( जैसे कि मेहेरगढ़, पिराक आदि)। भारत में भी लोथल, धोलावीरा, कालिबंगन, राखीगढ़ी, द्वारका, सरकोतदा, कोट दिजी, बाणावली, भगवानपुरा, आदि सैंकड़ों स्थल उत्खनन में प्राप्त हुए हैं । आधुनिक काल का पंजाब-हरियाणा भूभाग, वैसे ही सरस्वती-दृष्द्वती इन लुप्त नदियों का भाग, गंगा-जमुना दोआब, उत्तर प्रदेश का पूर्व भाग, तथा बिहार में भी, स्थल प्राप्त हुए हैं । इस का अर्थ यह हुआ कि यह सभ्यता सिंधु-प्रदेश के पश्चिमी भाग से बिहार तक फैली हुई थी । यह सभ्यता ईसा-पूर्व १९०० तक अस्तित्व में थी। ईसा-पूर्व १९०० के तत्पश्चात् सरस्वती नदी सूखने लग गई, और बाद के ४००-६०० वर्ष में वह लुप्त ही हो गई । इस कारण, तथा सिंधु नदी में बाढ़ आदि नैसर्गिक कारणों की वजह से, यहाँ के लोगों ने स्थलान्तर किया और के भारत के अन्य भागों में बस गए । उस काल के स्थल महाराष्ट्र तथा दक्षिण भारत में भी प्राप्त हुए हैं ।

 

यद्यपि सिंधु-सरस्वती सभ्यता के केवल नगर ही उत्खनन में प्राप्त हुए हैं, फिर भी यह बात स्पष्ट है कि उस समय गाँव थे, बस्तियाँ थीं, खेत थे, क्यों कि अनाज आदि के लिये नगरों को गाँवों की खेतियों पर ही निर्भर रहना पड़ता है ।  किन्तु, सहस्त्रो वर्षों के पश्चात् खेत, खलिहान, गाँवों की झोपड़ियाँ, इन के अवशेष मिलना कठिन ही ही है । फिर भी, उत्खनन में कुछ छोटी बस्तियाँ, ग्रामादि मिले हैं । सिंधु-सरस्वती सभ्यता की जो मुद्राएँ (Seals) मिली हैं, उन में से कुछ पर बैल के चित्र दिखाई देते हैं । इस का अर्थ यह है कि उस सभ्यता में गाय-बैल का बहुत महत्व था, और वह बात तो कृषिप्रधान-सभ्यता में स्वाभाविक ही है । एगबर्ट रिख्टर-उशानास (Egbert  Richter-Ushanas), सिंधु-सरस्वती-सभ्यता-लिपि के बारे में उनके ग्रंथ में बताते हैं कि, कुछ लिपि-चिन्हों के अर्थ इस प्रकार हैं : खेत, गाड़ी / गाड़ी चलानेवाला, यव (बार्ली),  चालनी, बीज (seeds), आदि । यह स्पष्ट है कि ये चिन्ह खेती से सम्बन्धित हैं ।

 

ऐसा अंदाज़ा लगाया जाता हैं कि, इस सभ्यता के उत्कर्ष काल में भारत में पचास लाख लोग रहते थे। इन में से मुख्य भाग तो सिंधु-सरस्वती-दृष्टद्वती के क्षेत्र में तथा गंगा-जमुना के दोआब में रहता था। इन लोगों के खाने के लिये अनाज तो आवश्यक था, याने कि खेती । वह नगरों के बाहर की ‘country-side’ में फैली हुई थी । सिंधु-सरस्वती सभ्यता के कुछ नगर-स्थलों में अनाज का संग्रह करने के लिये कोठार (भंडार) भी मिले हैं । सिंधु-सरस्वती सभ्यता के एक नगर ‘लोथल’ में जहाजों के लिये एक ‘डॉक्’ (dock) बनाया हुआ था, जिसमें नदी से पानी के आने-जाने के लिये नहरें बनाई हुई थीं । यदि उस सभ्यता के लोग इतना कठिन काम सहजता से कर सकते थे, तो उनके लिये, नदी तथा झरनों में से, नहरों-क्यारियों द्वारा खेत सींचने के हेतु पानी लाना कोई कठिन बात नहीं थी । फिर, कुँएँ भी तो होते ही थे, जिन से सिंचाई भी होती थी ।

 

वैदिक सभ्यता के काल तथा उसके बाद के काल की कृषि के बारे में हमें जानकारी मिलती है ऋग्वेद की ऋचाओं से, तथा बाद के साहित्य से, जैसे, अथर्ववेद, शतपथ ब्राह्मण, ऐतरेय ब्रह्मण, वाजसनेयी संहिता, तैत्तिरीय संहिता, अन्य ‘ब्राह्मण ग्रंथ’, ‘वशिष्ठ स्मृति’, आदि । ’शौनकीय अथर्ववेद’ बतलाता है कि ‘पृथि-वैन्य’ यह, कृषि का जनक था । हम यह कह नहीं सकते कि क्या यह किसी व्यक्ति का नाम था ; किन्तु ऐसा-शायद न हो । ‘वैन्य’ या उस से सम्बन्धित शब्द आधुनिक संस्कृत शब्दकोश में नहीं प्राप्त होते ; शायद यह ‘आर्ष-संस्कृत’ (वैदिक संस्कृत) का शब्द है । ‘पृथि-वैन्य’ का अर्थ, ‘पृथ्वी पर के वनों (बनों) से सम्बन्धित’, ऐसा भी शायद, ‘आर्ष-संस्कृत’ भाषा में हो सकता है । इसलिये, अथर्ववेद की इस उक्ति से ऐसा लगता है  कि, ‘बनों में से (बनों को नष्ट कर के) कृषिलायक भूमि तैयार की जाती थी’ । (इस चीज़ के बारे में हम आगे, थोड़ी-सी और बात करेंगे) ।

 

वैदिक ऋचाओं में ‘क्षेत्र’ तथा ‘क्षेत्रपति’ इन शब्दोंका प्रयोग मिलता है । ‘क्षेत्र’ से ही ‘खेत’ शब्द बना है । उस के अतिरिक्त, हमें उस समय की वैदिक भाषा में, तथा ‘कुछ-काल-के-पश्चात्-रूपान्तरित-हुई संस्कृत’ में, खेती से सम्बन्धित शब्द दिखाई देते हैं, जैसे कि,   हल, लाङ्गल (हल), सीर (हल), फाल (हल का फाल), सीता (याने, हल से खेत में बनाई हुई लकीर, कूँड ; अँगरेज़ी में ‘फ़रो’ Furrow ), परशु (एक प्रकार की कुल्हाड़ी ; किन्तु बाद में बना अर्थ : हँसिया, खुरपी,), सूर्प (चालनी, ए ‘सीव’ Sieve), काण (Corn), आदि । ‘कृषक’, ‘कृषीवल’ (किसान),  बैल के लिये ‘वृषभ’ और गाय के लिये  ‘गो’ तथा ‘गौ’ शब्द से हम परिचित हैं । [ फारसी में भी  ‘गो’ का अर्थ ’गाय’ होता है । यह कोई  आश्चर्य की बात नहीं है,  क्यों कि वैदिक संस्कृत तथा अवेस्तन भाषा –  जो आधुनिक फारसी की पूर्वज है – इन दोनों मे बहुत सा साम्य ( similarity) है ] । गाय उस संस्कृति का अविभाज्य अंग थी । गोबर का उपयोग खेतों में ‘खाद’ के रूप में होता है, तथा मट्टी के मकानों की लिपाई के लिये होता है ; गोबर सुखाकर जलाने के काम आता है । गाय के बग़ैर, दूध-दही-छाछ-मख्खन-घी आदि, तथा बैल भी, कहाँ से प्राप्त होते ? हल जोतने के लिये बैल आवश्यक थे ही, पर साथ ही में, अनाज ढोने के लिये, गाड़ियाँ खींचने के लिये, रहट चलाने के लिये, बैल आवश्यक थे । पुरातन ग्रंथ-संहिताओं में, दो बैलों से खींचे गए हल का ज़िक्र मिलता है; जब कि बाद के काल के ‘ब्राह्मण’ ग्रंथों में, हमें छ:, आठ, बारह, यहाँतक कि, २४ बैलों द्वारा खींचे गए, बड़े तथा भारी हलों का भी उल्लेख मिलता है । गोमय (गोबर) तथा गोमूत्र को भारतीय परंपरा में पवित्र और बहुगुणी माना गया है । गाय से सम्बन्धित अनेक शब्द हमें मिलते हैं, जिससे संस्कृति में गाय का महत्व अधोरेखित होता है । जैसे – गोप, गोपी, गोपाल, गोवर्धन, गोशाला, गोत्र (cow-pen), गोकुल, गोविंद, गोपती, गोपुर, गोष्ठ (cow-pen), गोव्रज (cow-pen), गोकील (हल), गोवर्धन, गोधूलि वेला, गोमुख, गोग्रास, गोरस (दूध), गोमूत्र, गोमय (गोबर), गोचर, गोमंत, गोमेद (a type of precious stone), गवाक्ष, गोरखनाथ, गोरखा (नेपाल तथा दार्जीलिग भाग में की जनजाति), आदि शब्दों से गाय का महत्व अधोरेखित होता है ।  आसाम की राजधानी का नाम है ‘गोहाटी’ (गुवाहाटी). हाट या हाटी अर्थ है बाज़ार.

सूर्यास्त का ‘गोधूलि बेला’ इस नाम से जाना जाता है । यही समय एक मुहूर्त के संदर्भ में ‘गोरज’ मुहूर्त के नाम से जाना जाता है ( कम से कम, महाराष्ट्र में तो यही मान्यताप्राप्त शब्द है ) । रज का अर्थ है धूल ।

 

कृष्ण के पिता का नाम था, ‘वसुदेव’ । वसु याने कि गाय का बछड़ा । धार्मिक परंपरा में ‘सवत्स धेनु’ को गोग्रास’ ( ग्रास : कौर) खिलाना पुण्यप्रद माना गया है । त्योहारों में, दीपावली के कुछ ही पहले, ‘वसुबारस’ मनाई जाती है । महाभारत में गंगा की कथा में ‘अष्टावसु’ओं का ज़िक्र है । नक्षत्रों में एक क नाम है ‘पुनर्वसु’ । इस प्रकार, पुरातन काल से ‘वसु’ का भी महत्व माना गया है । ( आज बंगाल में जो Basu या Bose उपनाम हैं, वे ‘वसु’ शब्द से ही बने हैं । बँगला भाषा में ‘व’ के स्थान पर ‘ब’ का उच्चार होता है ) ।

 

ऋग्वेद के काल नें रथों में भी बैल जोतते थे । इस प्रकार, कृषकों तथा ग्रामवासियों की सुरक्षा में भी बैल का, याने कि अप्रत्यक्ष रीति से, गाय का, सहयोग था । गाय तथा बैल उस काल के कृषि-आधारित जन-जीवन के लिये बहु-उपयोगी थे भीष्म, कर्ण जैसे वीरों को महाभारत में ‘वृषभ’ की संज्ञा दी है । शिव जी का वाहन नंदी भी एक वृषभ ही तो है । गाय को पवित्र पशु माना गया है ।

 

पुराणों में  ‘कामधेनु’ की काफ़ीसारी कहानियाँ हैं। गाय इतना बहु-उपयोगी पशु था, कि उस का ‘कामधेनु’ (‘इच्छापूर्ति करनेवाली गाय’) कहाना कोई अचरज की बात नहीं है । अत: कामधेनु की जादूई शक्ति की कथाएँ बन गईं ।

 

उसी प्रकार, कृषि के सम्बन्ध में, आरुणि की पौराणिक कहानी प्रसिद्ध है, कि, – ‘आरुणि के गुरु ने उसे झरने से खेत में पानी ‘चढ़ाने’ के लिये कहा; आरुणि ने बाँध बनाया, किन्तु वह बारबार पानी से टूटकर बहने लगा, और अन्त में आरुणि ने अपने शरीर का ही बाँध बनाया’ । और, जबतक गुरु स्वयम् नहीं आए, तबतक वह खेत में पानी देने, बाँध बना लेटा ही रहा’ । इस कथा से दीखता है कि ऋषिवर, गुरुवर आदि के भी खेत हुआ करते थे और उनका महत्व कितना हुआ करता था । पानी के लिये मिट्टी-पत्थरों से ‘बाँध’ बनाने का भी लोगों को ज्ञान था । वायव्य (उत्तर-पश्चिम) भारत में पुरातन-काल के ऐसे बाँध काफ़ी मिलते हें, जिन्हें आज ‘ग़बरबन्द’ कहा जाता है । इस शब्द का मूल ‘गोबरबाँध’ होगा, याने कि गोबर से ( अर्थात् उस में मिट्टटी, घासफूस, आदि मिलाकर) बनाया हुआ बाँध ।

 

ऋग्वेद आदि ग्रन्थों में हमें पर्जन्य के देवता की प्रार्थनाएँ मिलती हैं ; फ़सल काटनेके समय कहने की, आदि प्रार्थनाएँ मिलती हैं । यह देखिये एक ऋग्वेदीय ऋचा का भाग : ‘क्षेत्रस्य पतीना वसेम् न हितेने …. ’। अब देखिये कुछ अन्य ऋचाओं का अँगरेज़ी भाषान्तर :

  • ‘..May the Lord of the field be gracious to us’ ;
  • ‘O fortunate furrow ! Proceed onwards … ’ ;
  • ‘Fasten the ploughs, spread out the yokes, and sow the seed … ,

let the scythes fall on the … fields’.

ऋग्वेद के उत्तरकाल में तथा यजुर्वेदकाल में कृषि-सभ्यता अधिक विकसित हुई । ‘ब्राह्मण ग्रंथों’ के निर्माण-काल में कृषि की काफ़ी प्रगति हो चुकी थी ।

 

पुरातन साहित्य में हमें भिन्नभिन्न अनाज, फ़सलें, फल, तथा खाने की अन्य चीजों के नाम मिलते हैं, जैसे इक्षु (गन्ना), उर्वास (ककड़ी), खल्व (Black chick-pea), आदि । इस के सिवा, यव (barley), सक्तु (सत्तू), विहि (एक प्रकार का चाँवल), शस्यम् (एक प्रकार का चाँवल), गेहूँ, दालें, millets (जवार, बाजरा आदि), सींगें (beans), कुछ फल, कुछ फूल,  लाज (लाई), चंदन, विभिन्न प्रकार के तेल, कपास, चीनांशुक (रेशम), आदि का भी उल्लेख मिलता है । विभिन्न तेलों के लिये विभिन्न बीजों की आवश्यकता होती है, जो कि उगाने पड़ते हैं । उसी प्रकार, गन्ना, फल, फूल वगैरह, सिर्फ़ ‘जंगली’ (undomesticated) नहीं हो सकते, उन को भी बोना, उगाना पड़ता है । इस प्रकार, हमें यह दीखता है कि उस काल में कृषि में काफ़ी विविधता थी । वर्ष में दो फ़स्लें उगाने (Crop Rotation) के बारें में भी जानकारी थी । आयुर्वेद के विविध ग्रंथों में भी विविध वनस्पति, फल-फूल-पत्ते-जड़ों का ज़िक्र है ।

 

महाभारत-हरिवंश-भागवत आदि में भी इस सभ्यता का दर्शन होता है । महाभारत में गाय के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण घटनाएँ हैं, जैसे कि ‘घोषयात्रा’, (जो कि गायों की गिनती के लिये कौरवों ने की थी);  ‘गोग्रहण’, (जो राजा विराट का गोधन भगाकर ले जाने के लिये कौरवों ने किया हुआ आक्रमण था) । भिन्न भिन्न अनाजों के बारें में हम बाद में देखेंगे ही, पर यह बात महत्वपूर्ण है कि महाभारत में भी उस से सम्बन्धित उल्लेख मिलते हैं । यह एक उल्लेख –  आचार्य द्रोण के घर में (वे कौरव-पांडवों के गुरु बनने से पूर्व) बहुत ग़रीबी थी। जब उन का पुत्र अश्वत्थामा छोटा बच्चा था, एक बार वह दूध के लिये रोने लगा, तो द्रोण की पत्नी ने उसे सत्तू का पिसा हुआ आटा पानी में घोलकर पिलाया था । यह एक और उल्लेख –  जब पांडव अज्ञातवास में विराट के राज्य में थे, तब भीम ने बल्लव (याने कि रसोईया) का रूप लिया था । इस घटना का स्पष्ट अर्थ यह है की उस समय कृषिद्वारा अनाज उगाया जाता था ; अनाज के बिना तो खाना बन नहीं सकता । ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ तथा ‘तैतिरीय ब्राह्मण’ इन ग्रंथों में ‘पुरोडाश’, ‘पायस्य’, ‘करंभ’, ‘परिवाय’ आदि खाने के पदार्थों के नाम आते हैं । मध्य-युग के प्रकाण्ड पंडित तथा वेदों के भाष्यकार सायनाचार्य कहते हैं कि ये पकवान थे, जो चाँवल या यव से (बार्ली से) बनते थे । महाभारत में कृषि का एक अन्य उल्लेख मिलता है । भीम तथा दुर्योधन के अंतिम गदायुद्ध से पहले, युधिष्ठिर और दुर्योधन में संभाषण होता है, उसके दौरान दुर्योधन ने पृथ्वी को ‘क्षीणवप्रा’ कहा है । ‘वप्र’ इस शब्द का एक अर्थ ‘वह खेत जिसमें बीज बोया हुआ हो’, ऐसा होता है ।  इसे स्पष्ट कृषि का उल्लेख क्या हो सकता है ?

 

बलराम का एक नाम ‘हलधर’ प्रसिद्ध है । हल उस का शस्त्र नहीं था, जैसा कि कुछ लोग सोचते हैं ; उस का शस्त्र तो था गदा, जिस से द्वन्द्व-युद्ध करना उसने भीम तथा दुर्योधन दोनों को ही सिखाया था । बलराम का हल निश्चय ही कृषि का द्योतक है ; उस से कृषि का बोध होता है । हल कंधे पर लिये हुए (और एक हाथ में बैलों की डोर थामे हुए) खेत की तरफ जाने वाले किसान का ‘रूप’ तो सब को ही परिचित है । श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र वास्तव में एक शस्त्र हो या न हो, किन्तु एक बात ध्यान देनेलायक है, कि चक्र भी कृषिपशुपालनसभ्यता का एक प्रतीक है । चक्र का दर्शन हमेशा ‘सु-दर्शन’ ही तो होगा, क्योंकि गाड़ियों से अनाज खेत से घर या मंडी तक, या दूर दूर के प्रदेशों में भी, ले जाया सकता है, और गाड़ी के पहिये चक्राकार होते हैं ; खेत को सींचने के हेतु कुएँ में से पानी खींचने के लिये रहट की आवश्यकता होती है, और रहट के लिये भी चक्र ज़रूरी होता है ।  रहट के बैल का घूमना भी चक्राकार होता है ; कोल्हू का बैल भी चक्राकार घूमता है । जैसा कि इस लेख में पहले लिक्खा है, किसानों, ग्रामों तथा नगरों की सुरक्षा के लिये रथ उपयुक्त थे । और, रथ के पहिये भी चक्राकार होते हैं । याने कि, कृषिपर-निर्भर सभ्यता की सुरक्षा भी चक्र से जुड़ी थी । किसान के लिये एक अन्य चक्र का बहुत बड़ा महत्व है ; वह है ‘कालचक्र’ या ‘ऋतुचक्र’ । ऋतुएँ बदलती रहती हैं, और एक साल बाद यह चक्र पुन: शुरू हो जाता है । किसान के लिये इस ऋतुचक्र की जानकारी होना ज़रूरी हे, क्यों कि बीज बोना, वर्षा (मान्सून), फ़सल काटना, आदि के लिये इस ज्ञान की ज़रूरत होती है । उदाहरण के लिये देखिये –  ऋतुओं के संदर्भ से, फ़सलें दो प्रकार की होती हैं, ख़रीफ़ तथा रबी । उन के बोने-काटने की ऋतुएँ (सीज़न) भिन्नभिन्न होती हैं। ऋतुओं की इस विभिन्नता के कारण किसान खेत में एक ख़रीफ़ और एक रबी फ़सल ले सकता है । पशुपालन में भी ऋतुचक्र की जानकारी उपयुक्त साबित होती है । चक्र का खेती से, कृषि के उत्पादनों से, तथा पशुपालन से अटूट नाता है । यहाँतक कि, बाद के काल में, जिस सम्राट का साम्राज्य दूरदूर तक फैला हुआ हो, जो आसपास के नृपों से श्रेष्ठत्व प्राप्त कर चुला हो, उसे ‘चक्रवर्ती’ सम्राट कहा जाता था । अनेक देवी-देवताओं के हाथ में जो वस्तुएँ देखी जाती हें, उन में चक्र भी शामिल है । भाग्य के फेरे के लिये, या काल के साथ साथ जो बदलाव आता है उस के लिये,  ‘चक्रनेमिक्रमेण’ यह उपमात्मक-अभिधान तो प्रसिद्ध ही है । इस का अर्थ यह हुआ कि, यद्यपि चक्र का महत्व खेती के संदर्भ में आरंभ हुआ, पर तत्पश्चात् अन्य क्षेत्रों में भी वह महत्व फैल गया । इस बात से, खेती का जीवन के अन्य अंगों पर हुआ परिणाम स्पष्ट दीखता है ।

 

बलराम तथा श्रीकृष्ण का बचपन गोकुल-बृंदाबन में बीता था । यद्दपि गायें पालकर वहाँ के गोप-गोपी मथुरा में दूध-दही-मख्खन बेचते थे, मगर उन्हें साथ में, खेती करना भी आवश्यक था ; क्योंकि खानपान के हेतु अनाज आवश्यक है। इसीलिये तो पशु-पालन तथा खेती ये दोनों उपक्रम साथसाथ किये जाते थे । खेती के लिये पानी आवश्यक होता है ; गोकुलवासियों के लिये जमुना तो पास ही में थी । इसी प्रकार, श्रीकृष्ण के रासनृत्य के बारे में भी यह कहा जा सकता है, कि वह खेती से जुड़ी हुई घटना थी । खेत में धान तैयार होने पर, फ़सल कटने पर, खलिहान में अनाज तैयार होने पर, नृत्य-गायन की परंपरा तो ग्रामीण-सभ्यता में प्राचीन काल से ही रही है । एक और बात –  मथुरा तथा अन्य नगरों की मंडियों में दूध-दही के व्यतिरिक्त, अनाज भी बेचा जाता था । पुरातन काल में, कृषि से उत्पन्न अनाज, तथा साथ में, कपड़ा, मसाले के पदार्थ आदि बैलोंपर या बैलगाड़ियोंमें लादकर ब्योपारियों के सार्थ (काफ़िले) भारतवर्ष के हरएक भूभाग में घूमा करते थे । इसी कारण तो, कोई एक अनाज (जैसे कि चाँवल) जो एक विभाग में पैदा नहीं होता था, वह, उन रहिवासियों को दूसरी जगह से मिल जाया करता था ।

 

पहले हमने गोकुल तथा गोपुर इन शब्दों का उल्लेख किया है । गोकुल का अर्थ तो स्पष्ट है- ‘गो-कुल’ याने कि बह जनसमूह जो ‘गऊ’ के साथ ( गो-पालन के साथ) जुड़ा हुआ है। गोपुर (गोपुरम्) मंदिर के ऊपरी भवाग को कहा जाता है, ख़ास कर के दक्षिण भारत में । लेकिन उस शब्द का अप्रत्यक्ष संबंध भी गाय से ही है । ‘गो-कुल’ एक तरह से छोटी छोटी बस्तियाँ हुआ करती थीं, पर जब ऐसी बस्तियाँ बड़ी हो जाया करती थीं, तब वे ‘पुर’ कहलाती थीं । [  ध्यान रहे कि, ऋग्वेदीय काल के ‘पुर’ में ओर इस बादवाले काल के ‘पुर’ में भिन्नत्व है । ऋग्वेदीय काल के ‘पुर’ शब्द का, विविध विद्वान भिन्नभिन्न अर्थ निकालते हैं; मगर हम फ़िलहाल जिस काल की चर्चा कर रहे हैं, उस काल में ‘पुर’ शब्द का अर्थ स्पष्ट था, जो कि एक नगर के लिये प्रयोग में लाया जाता था । शायद, ग्राम से नगर में परिवर्तित होने की मध्य-स्थिति में, वह ‘पुर’ कहलाता था ] । इस प्रकार के गो-पुर में मंदिर बनने लगे थे । (ऋग्वेदीय काल में मंदिर नहीं थे) । इन मंदिरों का ऊँचा शिखर (जिसे अब गोपुरम् करते हैं) दूर से नज़र आता था, और उस से मालूम हो जाता था कि यहाँ ‘गो-पुर’ (स्थान) बसा हुआ है । इस प्रकार, हम देखते हैं कि, मंदिर के गोपुर का भी संबंध ‘गाय’ से जुड़ा हुआ हे ।

महाभारत की खांडवबन के दहन की कथा भी कृषि से जुड़ी हुई है । पांडवों को कुरुओं के राज्य का बँटवारा तो मिला । उन्हों ने इन्द्रप्रस्थ यह नया नगर बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया तय किया । साथ ही, उस नये राज्य का उत्पन्न का साधन क्या होगा, वह भी तो सोचना था । उस काल में, राज्य का उत्पन्न तो मुख्यत: कृषि पर ही निर्भर होता था। पांडवों को जो भूभाग बँटवारे में मिला था, उसे तथा उस के पास के भूभाग को ‘कुरुजांगल’ कहा जाता था ; इस नाम से पता चलता है कि, वहाँ ज्यादातर बन तथा अरण्य थे । (जांगल : Wild ; शायद ‘जांगल’ से ही जंगल शब्द बना है ) ।  उस जगह नगर बसाने और कृषि का आरम्भ करने से पहले रिक्त भूमि तैयार करना ज़रूरी था । आगे जाने से पहले, हम ‘बन’ तथा ‘अरण्य’ इन का फ़र्क़ समझ लें । ‘बन’ (संस्कृत : वन) जिस भाग को कहा जाता था, वह नगरों के बाहर का ‘अंडरडेवलप्ड़’ विस्तृत भूभाग हुआ करता था, और उस में घास-पौधे-बनस्पति तथा वृक्ष भी होते थे । बनों में खेती कम ही होती थी, किन्तु ऋषियों के जो आश्रम बनों में होते थे, उन के आसपास ही ऋषियों के बाग़ तथा उनके ही छोटेमोटे खेत हुआ करते थे, जिन में, केवल आश्रमवासियों को पूरा पड़े इतना अनाज उगाया जा सकता था। साधारणतया, बनों में, अन्य जनसाधारण वास नहीं करते थे ; आश्रमों के अलावा, वहाँ, कुछ अन्य जन-जातियों के टोलियों की छोटी-छोटी बस्तियाँ हुआ करती थीं, जैसे कि ‘नाग’ कहानेवाली टोलियों की । खांडवबन के अतिरिक्त, उस समय के अनेक बनों के नाम से हम आज भी परिचित हैं, जैसे मधुबन, बृंदाबन, काम्यकबन, द्वैतबन, आदि । बन (वन) शब्द से बने हुए बनवास, बनस्पति, बनौषधि, इन शब्दों से, तथा नगर के नाम वनस्थली (वंथली) से हम परिचित हैं । रामायण के समय का चित्रकूट भी बन ही था । अरण्यों में हम, दंडकारण्य, नैमिषारण्य आदि से परिचित हैं । अरण्यों मे अति-घनी वृक्षावली हुआ करती थी, इतनी घनी कि सूरज की रौशनी को ज़मीन तक पहँचने में तक़लीफ़ होती थी। रामायण के काल में अरण्य नें आश्रम नहीं थे ; वहाँ नाग, भील, किरात, शबर आदि (‘आदिवासी’) अप्रगत जन रहते थे (रामायण की ‘शबरी’ तो प्रसिद्ध ही है)। ये नाग, किरात, शबर, भील आदि टोलियाँ ‘हंटर-गैदरर’ इस अप्रगत स्थिति मे ही थीं, वे खेती नहीं करती थीं । किन्तु प्रगत नागरी-सभ्यता को तो खेती तथा उस से उगे हुए अनाज की सख़्त ज़रूरत थी । अत:, विस्तृत रूप से कृषि करने के लिये, बनों को जलाना तथा भूमि को खेतीलायक बनाना अवश्यम्भावी था ।  खांडवबन-दहन के पीछे की भूमिका यह है । इसी प्रकार, शतपथ ब्राह्मण में कुरुक्षेत्र-भूभाग के ‘विदेघ माथव’ नामक राजा का ज़िक्र है, जिस ने (सरस्वती नदी के सूखने के बा() गंगा के तट पर के बन जलाए और नगर तथा कृषि के लिये रिक्त जगह बनाई थी । महाभारत के बाद के काल में हमें अरण्यों की स्थिति भी बदली हुई दीखती है । महाभारत-युद्ध के काफ़ी बाद, जब एक लाख श्लोकों की महाभारत-संहिता का गठन तथा कथन हुआ, तब नैमिषारण्य में ऋषि-आश्रम मिलते हैं, जिस का अर्थ यह हुआ कि धीरे-धीरे भारतीय सभ्यता सर्वत्र, ‘हंटर-गैदरर’ स्थिति से ‘पशुपालन-खेती’ की स्थिति में तब्दील हो रही थी ।

 

गौतम बुद्ध से सम्बद्ध में एक कथा कृषि से जुड़ी हुई है, जिसका बाबासाहब अंबेड़कर ने विस्तृत वर्णन किया है । उस का कुछ भाग इस प्रकार है –   ‘शाक्य तथा कोलीय ये दोनों ही जनगण रोहिणी नदी के पानी का खेती के लिये इस्तमाल करते थे । हर साल दोनों में यह झगड़ा हुआ करता था कि पहले पानी कौन ले । इस झगड़े का परिणाम बोलाचाली में और कभी कभी हाथापाई में हुआ करता था  …..’ ( युद्ध का भी डर था) । देखिये खेती, पानी तथा सामाजिक संघर्षों का यह सम्बन्ध ।

 

कौटल्य (कौटिल्य) के अर्थशास्त्र में भी हमें कृषि के सन्दर्भ में उल्लेख मिलते हैँ । देखिये कुछ जानकारी : *ज़मीन तथा पानी के लिये सरकार करभार (टैक्स्) लेती थी, जिसे ‘उदक-भाग’ कहा जाता था । *‘सीताध्यक्ष’ नामक एक अधिकारी होता था, जिस का काम था खेती की ठीकठीक व्यवस्था रखना, तथा करभार वसूल करना । *जैसे सिंधु-सभ्यता में अनाज के लिये कोठार प्राप्त हुए हैं, उसी प्रकार अर्थशास्त्र में भी कोठारों का वर्णन पाया जाता है । *‘संनिधाता’ नाम का अधिकारी कोठारों की व्यवस्था देखता था । *अर्थशास्त्र में एक शब्द है ‘वार्ता’, जिस का अर्थ है, कृषि, पशुपालन, व्यापार, कारीगरी अथवा ‘कुशीलव’ (गाकर कथाएँ सुनानेवाले), ये उपजीविका के लिये व्यवसाय । *अर्थशास्त्र, नए गाँव बसाने के बारे में भी लिखता है । *ज़मीन कितने प्रकार की होती है, किसानों को अनाज की पैदावार करने के लिये किस प्रकार धन का ‘एडवांस’ दिया जा सकता है, किन हालातों में किसान को ‘टैक्स’ में छूट मिल सकती है और वह कितनी हो, आदि कई बातें अर्थशास्त्र में लिखी हुई हैं। *कौटल्य के समय वर्षा-ऋतु सावन के महीने से आरंभ होती थी (फ़िलहाल वह आषाढ में शुरू होती है)। *बादल कितने प्रकार के होते हैं, वर्ष-ऋतु में बारिश कब और किस प्रकार होने से वह अति-उपयुक्त होगी , और ‘अमृतवृष्टि’ कहलाई जायगी ; *नदी, तालाब तथा कुओं में से खेती के लिये पानी लेनेवाले किसान ने कितना प्रतिशत भाग सरकार को ‘टैक्स के रूप में देना चाहिये, आदि अनेकानेक बातों का अर्थशास्त्र में ज़िक्र है । *विविध धानों का भी अर्थशास्त्र में उल्लेख है, जैसे, चाँवल, तिल, मूँग, उड़द, मसूर, सक्तु (सत्तू), गेहूँ, द्विदल दालें, राई, आदि।

 

कौटल्य (कौटिल्य) का एक अन्य नाम चाणक्य था । कहा जाता है कि ‘चाणक्यसूत्र’ नामक सूत्ररचना भी इसी की है । देखिये कृषि से सम्बन्धित कुछ चाणक्यसूत्र :

  • न परक्षेत्रे बीजम् विनिक्षिपेत् । ( किसी दूसरे के खेत में बीज न डालें ) ।
  • अप्रयत्नोदकम् क्षेत्रम् । ( जहाँ परिश्रम किये बिना पानी मिले वह खेत सबसे अच्छा ) ।
  • यथा बीजम् तथा निष्पत्ति: । ( जैसा बीज वैसा ही परिणाम ) ।
  • संस्कृत: पिचुमन्दो न सहकारी भवति । ( नीम के पेड़ पर कितने भी संस्कार क्यों न करें, वह आम का पेड़ नहीं बनता ) ।
  • निम्बफलानि काकैर्भुज्यन्ते । ( नीम के फल तो कौवे ही खाते हैं ) ।
  • धेनोश्शीलज्ञ: क्षीरम् भुङ्क्ते । ( जिसे किसी गाय की आदतें मालूम होती हैं, उसे ही उस गाय का दूध मिलता है ) ।

 

संस्कृत के विविध ग्रन्थों में कृषि के संदर्भ में लिखा गया है, जैसे कि काश्यपीय कृषिसूक्त, कृषि-काण्डम्, उपवनविनोद, वृक्षायुर्वेद, वृक्षवल्लभ, कृषि-पराशर, वराहमिहिर की बृहत्-संहिता, आदि । इन में कृषि-पराशर एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है । पाली में भी कस्सक-सुत्त (कृषक-सूक्त) जैसे ग्रंथ उपलब्ध हैं । पाली के सुपण्णखत्त जातक, सालिकेदार जातक आदि में भी कृषि का ज़िक्र है ।

 

आइये देखें कुछ बातें कृषि-पराशर के बारे में । पराशर ऋषि का नाम साहित्य में  वैदिक काल से ही आता रहता है । महाभारत तथा अर्थशास्त्र में भी उस का उल्लेख पाया जाता है । महाभारत के रचयिता ऋषिवर व्यास के पिता थे पराशर ऋषि । भिन्नभिन्न विज्ञानों के सम्बन्ध में पराशर का नाम जोड़ा जाता है , जैसे कि, कृषि, वैद्यक, खगोलविज्ञान, ज्योतिषविज्ञान, सामाजिक नीतिनियम, आदि । सारे के सारे विज्ञानों से सम्बन्धित, एक ही ( दि सेऽम) पराशर नहीं हो सकते । पुरातन भारत में किसी विचारधारा के किसी गुरु के शिष्यगण भी उसी सम्बन्धित नाम से जाने जाते थे । साथ ही, एक ही गोत्र के लोग (वंशज) उनके गोत्र-नाम से ही जाने जाते थे ।

 

{ हम देखें कुछ उदाहरण । विश्वामित्र हमें ऋग्वेद काल में मिलते हैं, गायत्री मंत्र के रचयिता वे ही हैं ; वे जन्म से क्षत्रिय थे, पर तप:सामर्थ्य के कारण ‘राजर्षि’ कहलाए ; दाशराज्ञ युद्ध, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में है, उस में भी विश्वामित्र का सम्बन्ध है ; प्रतिसृष्टि निर्माण में भी विश्वामित्र का नाम आता है ; त्रिशंकु को स्वर्ग में धकेलने का प्रयास करनेवाले विश्वामित्र ही हैं ; अप्सरा मेनका को देख, मोहित हो कर, तपोभंग होनेवाले, (और जिस के साथ किये हुए समागम से शकुंतला का जन्म हुआ), ऋषि विश्वामित्र ही हैं ; राजा हरिश्चंद्र की पौराणिक कथा में भी विश्वामित्र हैं, जिन्हें ख़्वाब में दिये हुए दान के फलस्वरूप हरिश्चंद्र को दरदर भटकना पड़ा ; रामायण-काल में भी विश्वामित्र है, जो राम को सीता-स्वयंवर में ले जाते हैं । वैसे ही परशुराम का भी है । वे श्रीरामचंद्र के काफ़ी पहले के काल के हैं । पुराणों के अनुसार उन्हें विष्णु का छठा अवतार माना गया है, जब कि श्रीराम को सातवाँ अवतार । दोनों के काल में काफ़ी अंतर है । पर हमें परशुराम, रामायण-काल में भी मिलते हैं, उन का राम से युद्ध हुआ दिखलाई देता है ; महाभारत काल में भी परशुराम हैं, जिन्हों ने भीष्म तथा कर्ण को धनुर्विद्या सिखलाई, और, ध्यान में रहे कि भीष्म तथा कर्ण में तीन पीढ़ियों का अंतर है । दरअसल, यद्यपि चित्रांगद तथा विचित्रवीर्य, (विचित्रवीर्य याने कि पंडु और धृतराष्ट्र के पिता), ये दोनों भीष्म के सौतेले भाई थे, किन्तु उम्र के लिहाज़ से, वे भीष्म से काफ़ी छोटे थे । इस तरह देखा जाय तो, भीष्म तथा कर्ण में चार पीढ़ी का फ़र्क़ कहा जा सकता  है । वशिष्ठ का भी ऐसा है । ऋग्वेद में वशिष्ठ की ऋचाएँ हैं , दाशराज्ञ युद्ध से भी उन का सम्बन्ध है , और, श्रीरामचंद्र के पिता दशरथ के कुलगुरु भी वशिष्ठ ही हैं । पराशर भी, महाभारत के रचयिता कृष्णद्वैपायन व्यास के पिता थे, और विभिन्न विज्ञानों के ग्रंथों के रचयिता भी पराशर ही थे। विश्वामित्र क्या, परशुराम क्या, वशिष्ठ क्या, पराशर क्या, एक ही व्यक्ति इतने बड़े काल तक जीवित नहीं रह सकता । इस का अर्थ स्पष्ट है कि वे भिन्नभिन्न व्यक्ति थे जिन का गोत्र / कुलनाम एक था, याने कि वे एक ही कुल-शृंखला के, पर भिन्न पीढ़ियों के थे । आज भी तो हमें यही बात उपनामों के द्वारा (कुलनाम, अंगरेज़ी में : ‘Surname’) दीखती है } ।

 

‘कृषि-पराशर’ ग्रंथ का रचना-काल निश्चित रूप से मालूम नहीं है । कुछ लोग इसे अर्थशास्त्र के पूर्व-काल का मानते हैं, तो कुछ लोग इसे ईसवी की पहली से छढी सदी तक के कालखंड का मानते हैं । मगर एक बात तो निश्चित है, कि, यह ग्रंथ कृषकों के लिये लिक्खा गया है । चलिये, हम इस २४३ चरणों के ग्रंथ के बारे में संक्षेप में देखें :

  • बादल ४ प्रकार के होते हैं । उन के नाम तथा उनके बारे में अन्य जानकारी भी दी हुई है ।
  • फ़सल की भिन्नभिन्न स्थिति में, वर्षा का पूर्वानुमान (prediction) कैसे लगाया जाय ।
  • कुछ ग्रह-तारों की आकाश में स्थिति, किसी ख़ास बादल का आकाश में होना, हवा की दिशा, कुछ विशिष्ट दिनों नें नदी के पानी की सतह की गहराई, पशुओं का बर्ताव ; इन बातों से वर्षा के बारें में अनुमान कैसे लगाया जाय ।
  • ‘जलधारक’ यन्त्र से बारिश के मापन का तरीक़ा ।
  • हल, उस के भाग, तथा उन के नाप ।
  • औज़ारों की जानकारी, पशुधन का व्यवस्थापन, बीजों को कैसे ठीक तरीक़े से संग्रहित करके रक्खा जाय ।
  • औज़ारों में, २१ ‘दाँत’वाले ‘दन्तक’ फाल का ज़िक्र है (Harrow), जिसे इस ग्रंथ में ‘विद्धक’ नामांकन है ।
  • इस ग्रंथ में कृषि से सम्बन्धित अनेक विषयों पर लिक्खा हुआ है, जैसे :

गाय-बैलों का व्यवस्थापन, खाद के बारे में, हल चलाना, बीज इकट्ठा करना, बीज बोना, बीज बोने के लिये ‘कूँड’ (furrow) कैसे बनाई जाय, कौन सी फ़सल को कब बोना चाहिये, पानी खेत में कैसे रोक के रखा जाय (retention), अतिरिक्त-पानी को खेत से कैसे बाहर निकाला जाय (drain out), उगे हुए अनाज में से तृण तथा अन्य तक़लीफ़देह घासफूस को कैसे निकाल फेंका जाय (weeding), उगी हुई फ़सल की सुरक्षितता, फ़सल काटना, कटी फ़सल की गिनती, ‘पुष्ययात्रा’ त्योहार, आदि । पुरातन काल में इतना उपयुक्त ग्रंथ लिखा गया, यह निश्चित ही तारीफ़ेक़ाबिल बात है ।

 

संस्कृत के ‘न्याय-दर्शन’ में ‘बीज-क्षेत्र न्याय‘ एक प्रसिद्ध ‘न्याय’ है । ( निर्णय के लिये ‘गाइडंस’ या आधार । तथा, ‘न्याय’ याने कि क्या ‘योग्य’ है, या कि अमुक एक घटना के पीछे की कारणमीमांसा क्या है, आदि  । जैसे ‘रज्जु-सर्प न्याय’, ‘धूम (धुआँ) – वन्हि (अग्नि) न्याय’ । इसी तरह कृषि से सम्बन्धित एक ‘न्याय’ है उपर्युक्त ‘बीज-क्षेत्र न्याय’ । इसका अर्थ यह होता है कि, ‘बीज किसी का भी हो, पर जिस खेत में वह गिरता है, वहाँ की फ़सल खेत के मालिक की हो जाती है’ । (इस ‘न्याय’ पर आधारित एक तत्कालीन सामाजिक-परंपरा भी बनी थी । किन्तु उस में जाने की फ़िलहाल आवश्यकता नहीं है ) ।

 

कृषि के बारे में हम सिर्फ़ ग्रंथोंद्वाराही जान सकते हैं, ऐसी बात नहीं है । पुरातत्वविज्ञान अब काफ़ी तरक़्क़ी कर चुका है । पुरातत्व-वैज्ञानिकों ने कई स्थानों पर उत्खनन करके बहुमूल्य जानकारी प्राप्त की है । हम केवल कृषि से सम्बन्धित जानकारी ही देखेंगे ।

*इन वैज्ञानिकों को उत्खनन में ‘बोने-योग्य’ (domesticated, याने कि ‘जंगली’ नहीं) चाँवल ईसापूर्व सातवें सहस्त्रक से प्राप्त हुआ है ।

*उस समय से लेकर, ईसा-के-प्रथम-सहस्त्रक-के-पूर्वार्ध तक के काल की, पुरातत्व-विद् जनोंको जो जिन अनाज, फलों, सब्ज़ियों आदि के बारे में जानकारी उत्खननद्वारा प्राप्त हुई है, वे इस प्रकार हैं  : (फेहरिश्त लंबी है ; उस में से कुछ ही नाम हम यहाँ देखेंगे) –

*चाँवल, गेहूँ, यव (बार्ली Barley), पुदीना, मूँग, तिल, राई, उड़द, दालें, जवार, बाजरा, आमला, चना, मनुका, रागी (ragi), सरसों, मटर, लौंग, कुंदरू, तरबूजा (जो कि आफ़रीका खंड में प्रथम पाया गया है ; अर्थात् उस का भारत में आगमन आयात के स्वरूप हुआ है), कटहल, खजूर (जोकि उत्तर-पश्चिम भाग से आया है), अंगूर, शहतूत, चवलाई, आदि।

* जिन पेड़ों तथा वनस्पतियों के बारे में जानकारी मिली है, उन में से कुछ हैं  :

आम, नील (Indigo), हरीतकी (हर्रा), महुआ, तुलसी, नीम, शीशम, ढाक, साल, साग,  बभूल, नागकेसर, धतूरा, भंग, कपास, जायफल, चिरौंजी, अमलतास, बाँस, ‘पान’ / नागबेल  (betal leaves), रेंडी (Castor), आदि ।

 

तरबूजा आफ़रीका से तथा खजूर उत्तर-पश्चिमी भाग से (बलुचिस्तान आदि) आयात होकर गंगा-जमुना दोआब में आया है, (और फिर वहाँ उन की उपज होने लगी), इस का ज़िक़्र तो पहले किया ही है ;  मगर साथ साथ अन्य वस्तुओं की भी उस समय आयात-निर्यात होती रही है, जैसे, दक्षिण-भारत के मैसोर-तमिलनाडू भूभाग से चंदन ; हिमालय (तराई) भूभाग से भोजपत्र / भूर्जिपत्र के लिये विशिष्ट वृक्षों के तनों की खाल ; यवद्वीप (जावा) के ‘मलाक्का’ भूभाग से जायफल, इस प्रकार की आयात होती रही है । सिंधु-सरस्वती भूभाग तथा गंगा-जमुना दोआब में भी इस प्रकार का आदान-प्रदान हुआ है (जैसे कि चाँवल) ।  मध्य-पूर्व एशिया (Middle-East Asia) की तत्कालीन सभ्यताओं के उत्खनन में सिंधु-सरस्वती सभ्यता की मुद्राएँ (Seals) मिली हैं । इन सब से यह जानकारी मिलती है कि, उस समय की भारतीय सभ्यता में केवल पशुपालन तथा कृषि ही नहीं, वरन् देश के अंतर्गत और बाहरी देशों से ब्योपार तथा आयात-निर्यात चल रही थी । निश्चय ही भारतीय सभ्यता, उस समय के अति-प्रगत सभ्यताओं में से एक थी।

*

कहा जाता है की आज का युग ‘कलिजुग’ है । ‘कलिजुग’ के बारे में कुछ कहना कठिन है, और, इस लेख में वह अभिप्रेत भी नहीं ; मगर यह आज का युग निश्चय ही  ‘कल-जुग’ है, याने की ‘यन्त्र-युग’ । इस के बावजूद, हज़ारों वर्षों से चलती आई भारत की कृषि-परंपरा बदली नहीं है ; भारत आज भी कृषि-प्रधान देश कहलाता है । यह सच है कि आज हमारे सम्मुख अड़चनें भिन्न हैं, चैलेन्जेज़् भिन्न हैं, मगर हम आज भी अपनी पुरातन कृषि-परंपरा, पुराना कृषि-ज्ञान, पानी का उपयोग, ब्योपार, आदि से कुछ न कुछ सीख अवश्य ले सकते हैँ, उत्साह ले सकते हैं, बढ़ावा ले सकते हैं ; और उन सब को उपयोग मे ला सकते हैं । ऐसा न हो कि, हम इतिहास से कुछ न सीखें ; आगामी आपत्तियों से जूझ न पाएँ ; कृषि की तक़्लीफों से किसान आत्महत्या करते ही रहें; पानी की कमी के कारण राज्य राज्यों से लड़ते ही रहें, हज़ारों-लाखों लोग भुखमरी का शिकार होंते ही रहें ; और हमें सखेद, रुँधे गले से कहना पड़े, ‘जब चिड़ियन खेती चुगद डरी, तब पछताए क्या होवत है ?’ नहीं, इस चित्र को हम वास्तविकता में परिवर्तित नहीं होने देंगे। उस स्थिति से उबारने के लिये उपाय हैं ही, उन के बारे में जानकारी लेकर,     दृढ़ निश्चय से हम में से हर एक को उस पर अमल करना होगा । तो ही स्वर्णिम भूतकालवाले इस ‘सस्य-शामल’ (सस्य : Corn, Grain) देश का भविष्यकाल भी उज्ज्वल होगा ।

 

चलिये, हमारे प्रिय इस पुरातन भारत देश के लिये हम ऋग्वेद में से ली हुई प्रार्थना करें, ‘हे खेतों के देवता, हम पर कृपादृष्टि रखना’ ; और वह ‘कृषि का देवता’ निश्चय ही कहेगा, ‘तथास्तु’, ‘ऐसा ही हो’ ।

 

+ + +

 

  • सुभाष स. नाईक

सांताक्रुज़, मुंबई.

दूरभाष : २६१०-५३७६५

भ्रमणभाष : ९८६९००२१२६.

ई-मेल : vistainfin@yahoo.co.in

वेब-साइट : www.subhashsnaik.com ; www.snehalatanaik.com

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