धरा मैं माँ तुम्हारी

धरा मैं माँ तुम्हारी , जरा सम्मान करो
चमन से मैल मिटा दो, स्वर्ग के रंग भरो ।

घुटे तालाब नदियाँ , रो रही गंगा पावन
टनों कूड़े-करकट से जानपर है आई बन
उदक है अमृत , उसको हलाहल ना करो ।

मंद मधु कोमल लोरी झुलाती है हिंडोला
तीव्रतम कोलाहल-ध्वनि शांतिपर करती हमला
चाह है मृदु थपकी की, हथौड़े से ना मारो ।

न पूछो ये किसीसे, ‘जरूरत क्या हवा की’?
मिनटभर भी हवाबिन प्राण रहते न बाकी
सराहो अहमियत को, सहारे को सँवारो ।

कवच पर्यावरण का तुम्हारे ही लिये रे
शुद्धता शक्त ना, तो कोई कैसे जिये रे ?
तुम्हींने है बिगाड़ा, तुम्हीं इसको सुधारो ।

सभी जीवों की ही है सृष्टि को आवश्यकता
नासमझ काम कुछ भी हानि है पहुँचा सकता
प्रकृतिसन्तुलन को नेस्तनाबूद ना करो ।

भले हो बदन अधूरा, जेहन में या कमी है
स्नेह का पूर्ण ही हक, क्योंकि वो आदमी है
ईसामसीह जैसे प्यार बाँटो, ईश के पुत्रो ।

झुग्गियों का घन जंगल, साथ बदबू-दलदल है
न मिलता पूरा खाना, न पाखाना, न जल है
अहल्यासम ये जीवन, उबारो राम के प्यारो ।

कटाकर ही गर्दन, क्या आदमी सच जान पाता है?
एकजैसा सबोंके ही लहू का रंग होता है
महात्मा गांधी जैसे सब अहिंसाधर्म स्वीकारो ।

बकासुर संस्कृति अपनी, निगलती भक्ष्य नवनव
मारता है कुदरत को रोज हत्यारा मानव
बचा पाओगे कैसे भविष्य को, दश अवतारो ?

कहाते अक्लमंद, फिर भी रहे नादान बनकर तुम
जानवर से भी करते हो हरकतें हीनतम,नर, तुम
निजपतन रोक लो रे, स्वयम् को अब उबारो ।

बडी नेमत ये विरासत, करो इसकी हिफाजत
यही भगवान की पूजा, खुदा की ये इबादत
है दुनिया एक केवल, नहीं मिलतीं हजारों ।

जगत्सम्राट बने थे, मिटे डाइनोसर सारे
वंशका नाश करेंगे नरो निजकर्म तुम्हारे
ना करो हाराकीरी , कयामत से डरो ।

त्सुनामी ही ढाएगा जहर का बढता सागर
खत्म विष करने आए कहाँ से दूजा शंकर ?
बनो अब तुम खुद ही शिव, अरे नर नामक असुरो ।

बडी है मुश्किल मंजल, असंभव किन्तु नहीं है
कार्य पर्वत सा भारी , चुनौती तो यही है
सृष्टिगोकुल बचानेको बनो आधार गिरिधरो ।

— सुभाष स. नाईक
सांताक्रूझ, मुंबई
दूरध्वनी : (022) 26105365.
भ्रमणध्वनी : (0)9869002126.

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*