जुनून

इन्सान ये जुनून क्यों कम नहीं पाता ?
दो मज़हबों का खून क्यों थम नहीं पाता ?

अबतलक दोनों तरफ थी बेदिली थी बेरुखी
एक पल में आग बरसी, फट पड़ा ज्वालामुखी
तकता जहाँ गुमसुम बुत सा, हिल नहीं पाता ।

रहमदिल इन्सान कैसे आज वहशी हो गया ?
सिर्फ आहें आज बाकी, चैन सारा खो गया
ढूँढ के भी सुकून किसी को मिल नहीं पाता ।

भाइयों की उठ रही शम्शीर भाईपर यहाँ
दिनदहाड़े कत्ल अब इन्सानियत का हो रहा
बेबस मगर कानून, जरा भी चल नहीं पाता ।

दूधपीते सो गए बच्चे हमेशा के लिये
मस्कुराते फूल कल थे, वो कटे, कुचले गए
अब एक भी मासूम आग से बच नहीं पाता ।

रामप्यारा नाम जिसका, वो बना रावण नया
नेक अल्लाबक्ष अब शैतान कैसे बन गया?
है लगी जेहनको घुन, आदमी चुन नहीं पाता ।

आज नफरत के सिवा कुछ भी नहीं आता नजर
किसक़दर फैला हुआ है दिलदिमागों में ज़हर !
दुश्मनी त्यज कोई हमदम बन नहीं पाता ?

जानवर हैं, किस तरह इन्सान ये कहला सके?
हर तरफ दैरोहरम के अश्क बहते ना रुके
मिलता नहीं अमन, चमन ये खिल नहीं पाता ।

जुनून : उन्माद ज़ेहन : बुद्धि
दैरोहरम : मंदिर-मस्ज़िद अमन : शांति

(कुछ वर्ष पूर्व के, गोघ्रा-हत्याकांड तथा गुजरात की riots, दंगेफ़साद, इन के संदर्भ में, मन में आए हुए विचार । )

— सुभाष स. नाईक

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