जुदाई

(सदमा सहचारिणी का)

यूँ जुदाई से मिलेंगे, ये कभी सोचा न था
दर्द के तूफाँ चलेंगे, ये कभी सोचा न था ।

ख्वाबगाहे आँख में सपने बसे लाखों हसीं
अश्क यूँ यल्गार करेंगे, ये कभी सोचा न था ।

रंग थे, खुशबू , खिले गुल, था बहारों का समाँ
खार ही दामन भरेंगे , ये कभी सोचा न था ।

जंदगी का चूम प्याला, मै खुशी की थी चखी
जामे गम से लब जलेंगे, ये कभी सोचा न था ।

हाथ आया हाथ में तो राह में जन्नत मिली
रास्ते दोजख बनेंगे , ये कभी सोचा न था ।

‘साथ जुगजुग हम रहेंगे’, साथ ली कल ही कसम
तुझ को ‘गुजरा कल’ कहेंगे, ये कभी सोचा न था ।

तू गया तब से हमारे जिस्म में भी जाँ नहीं
लाश बनके साँस लेंगे, ये कभी सोचा न था ।

(मेरी आगामी बहुभाषिक किताब
‘हाथ मिलाये बिना गया वो’ में से )

– सुभाष स. नाईक

यल्गार : आक्रमण, हमला, Assault
मै : शराब, मदिरा
जन्नत : स्वर्ग
दोजख : नर्क

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