चाहे कहो लल्ला या चाहे रामलल्ला

चाहे कहो अल्ला या चाहे रामलल्ला
काहेको शोरशराबा, क्यूँकर हल्लागुल्ला ?

मंदिर था मस्जद थी, झगड़ा क्यों भाई ?
खत्म हुई एक सदी, नई सदी आई
रात गई बात गई, सूर्य नया निकला ।

फर्क नहीं पड़ता है जो भी मजहब हो
नाम राम श्याम हो या अल्ला रब हो
बात यही सच्ची , पर हर कोई भूला ।

एक बात जानो तुम, पहले इन्साँ हो
बाद उसीके ही हिंदु या मुसलमाँ हो
क्यों फिर यह मजहब का भड़का है शोला ?

मजहब हो कोई भी, एक ही वतन है
रंगे गुल कुछ भी हो, एक ही चमन है
उसने सब के लिये अपना खजाना खोला ।

दफना दो सारे, मजहब की उलझन को
सब मिलकर सींचो इस प्यारे गुलशन को
गुलिस्तान ही ना हो, तो क्या अल्ला लल्ला ?

(अयोध्या में बाबरी मस्जिद और रामलल्ला के जन्मस्थान को लेकर
जो हलचल पिछले काफ़ी वर्षों से मची हुई है, उस पर के विचार । )

– सुभाष स. नाईक

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