क्यूँकर?

हाथ पेशानी पे इतनी बार क्यूँकर ?
हाय ! मैं जंदा तेरे बिन, यार, क्यूँकर ?

चाह थी बस, शाम सेहतमंद होवे
दोपहर ही लाइलाज आजार क्यूँकर ?

जिंदगी-चक्रव्यूह भेदा, यश है तेरा
जीत से इस, हाय! मेरी हार क्यूँकर ?

फट गया दिल, सत्य है ये बात, लेकिन
आँसुओं का इस तरह बाजार क्यूँकर ?

याद जब तेरी, मेरे मन में सजी है
बाँधना है फिर तेरा मजार क्यूँकर ?

जब तुझे निज हृदय में ही खोजना है
जाप-पूजापाठ के औजार क्यूँकर ?

शै हरेक मिट जाएगी, मति जानती है
तो तुझे खोकर हृदय बेजार क्यूँकर ?

पेशानी : ललाट
मजार : समाधि, Grave, Tomb
शै : वस्तु, Object

(मेरी आगामी बहुभाषिक किताब
‘हाथ मिलाये बिना गया वो’ में से )

– सुभाष स. नाईक

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