क्या इसीलिये आज़ादी हमने पाई ?

चूर हुई तस्वीरे वतन जो मुद्दत से सँजोई !
क्या इसीलिये आज़ादी हमने पाई ?

टूट गया वो ख़्वाब, बसा जो दिल की गहराई में
निकला चोटीतक चढ़ने, पर गिरा वतन खाई में
खुशियोंभरी सुबह आतेही स्याह शबे गम छाई ।

तोड़ गुलामी की ज़ंजीरें आजादीको पाने
जंग छिड़ी तो लगीं दाँवपर लाख कीमती जानें
वतनपरस्तों की क़ुर्बानी हमने हाय! भुलाई ।

मिलते थे इन्सान अजनबी, भाई बन जाते थे
दुश्मन के आगे चट्टानों जैसे ठन जाते थे
अब आपस में ही टकराते रहते भाई भाई ।

मुल्क कटा तो भी ना ढहते मज़हब के परकोटे
जातपात के खींच दायरे हमने इन्साँ बाँटे
अब अपनी मादरेजुबाँ भी लगने लगी पराई ।

फूले नहीं समाते, अपनी पीठ ठोंक लेते हम
‘हुई तरक़्क़ी’ कह आँखों में धूल झोंक देते हम
बस, आबादी में ही है दुनिया से होड़ लगाई !

आज किसी को कोई रिश्ता लगता नहीं करीबी
दिल को छूती नहीं सब तरफ फैली हुई ग़रीबी
बढ़ती है ख़ुदगरज़ी, घटती रोज-ब-रोज भलाई ।

बंद आँख है, दर्द किसी का देता नहीं दिखाई
बंद कान हैं, चीखें-आहें देती नहीं सुनाई
बंद दिमागों की ताले से होती नहीं रिहाई ।

कैसे भूलें, कभी यही था हराभरा बाग़ीचा
मुरझाए रंगीन फूल, काँटों ने गला दबोचा
विफल हुई, पुरखों ने की जो निज खून से सिंचाई ।

क्या इसीलिये कितनों ने ही मग़रूर लाठियाँ झेलीं ?
क्या इसीलिये रोकी सीनोंपर लाख बेरहम गोली ?
क्या इसीलिये थी हिंदोस्ताँपर उनने जान लुटाई ?

आग बदन में लगती है, पर कुछ ना कर सकते हम
पटक पटक सर दीवारोंपर, बेबस हो रुकते हम
कहाँ करें फरियाद? कहीं भी होती ना सुनवाई ।

ढलते ही अब अश्क रहेंगे ; कोई ना पोंछेगा
‘वतन सिसकियाँ भरता है क्यों?’, कोई ना सोचेगा
फ़िक्र करेगा क्यों कोई? है नहीं क़यामत आई !

(आजादी प्राप्त करने के पश्चात् के इन दशकों में देश के जो बद से बदतर हालात हुए हैं, उन्हें देख कर, एक senior citizen,, ज्येष्ठ नागरिक, का क्रंदन )

शब : रात वतनपरस्त : देशभक्त
मादरेजुबाँ : मातृभाषा, Mother Tongue
ख़ुदगरज़ी : स्वार्थीपन , selfishness
क़यामत : प्रलय , Doomsday –

— सुभाष स. नाईक

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