कहा न जाय

मन विकल हुआ है कितना , कहा न जाय
जो घाव हु्आ है गहरा , सहा न जाय ।

इन आँखों से झर झर झर गिरता सावन
ले मुझको खारी वर्षा बहा न जाय ।

जिस जगह ‘अल्विदा’ कहा दोस्त को मैंने
भगवन्, यह पाँव दुबारा वहाँ न जाय ।

मैं करूँ कोशिशें कैसे बिसरानेकी ?
क्या करूँ, यादबिन, मितवा, रहा न जाय ।

अति दूर गया वो, फिर भी भेंट हमेशा
मन उड़ान भरता , काया जहाँ न जाय ।

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