कर दिया मुझे दुनिया ने लहूलुहान *

मौत मुझे दे , ले ले मेरी जान , भगवन्, अल्ला
कर दिया मुझे दुनिया ने लहूलुहान , भगवन्, अल्ला ।

मेरी सीधी बातें सुनके छा जाती खामोशी
सीधासादा मैं क्या जानूँ क्या है नकाबपोशी?
तौरतरीकों से दुनिया के पूरा हूँ अनजान , भगवन्, अल्ला ।

खुलेआम हर एक आदमी वफा बेचता है
बच चुका तो, और दूसरी दफा बेचता है
मोल लगाके बेच रहा इन्साँ अपना ईमान , भगवन्, अल्ला ।

हाथ जोड़ मैं गया, मगर मगरूरी ने ठुकराया
दर दर की खाई ठोकर, दामन में कुछ ना आया
चलते रुकत गिरते-पड़ते हो गया बेजान , भगवन्, अल्ला ।

इन्सानों की संगदिली से टूटा मेरा दिल
एक कदम भी आगे बढ़ना हो गया मुश्किल
जंदगी के चक्रव्यूह का भेद नहीं आसान , भगवन्, अल्ला ।

तरस कजा को क्यों ना आता मेरी हालतपर ?
ना लेती आगोश में क्यों, रहम क्यों न मुझपर ?
विकल इल्तजा, कोई ला दे मौत का सामान , भगवन्, अल्ला ।

कजा : मृत्यु
आगोश : आलिंगन
इल्तजा : बिनती
संगदिली : निर्दयता

— सुभाष स. नाईक

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