एक और भोपाल

भोपाल की एक फैक्टरी ।
जानकार कहते थे कि
किसी भी वक्त वहाँ
हादसा हो सकता है ।
मगर किसीने ध्यान ही नहीं दिया ।
और एक दिन वहाँ
बहुत सारी विषैली गैस लीक हुई ।
हजारों मरे,
लाखों व्याधिग्रस्त हुए,
कितने ही घर बरबाद हो गए ।
बहुत बड़ी ट्रेजेडी हुई !

पच्चीस साल गुजर गए,
पर अबतक
लोग उस विष के परिणामों से उभरे नहीं हैं ।
और, उबारनेवाला भी कोई नहीं ।
हाय रे हाय !

हाय रे हाय !
इस पृथ्वी पर
प्रदूषण तेजी से फैलता जा रहा है ।
जानकार कह रहे हैं कि
किसी भी वक्त यहाँ
बड़े बड़े हादसे हो सकते हैं ।
मगर कोई ध्यान ही नहीं दे रहा ।
और, एक दिन
सारी पृथ्वी ही
भोपाल जैसी विषैली हो जाएगी !
कितने मरेंगे ?
कितने व्याधिग्रस्त होंगे ?
कितने घर बरबाद होंगे ?
हजारों, लाखों, करोडों ?

और फिर,
कबतक मानवजाति
इस विष के परिणाम भुगतेगी ?
कितने दशक ?
कितने शतक ?
या कि कुछ सहस्त्रक ?

आप ही सोचिये।
आप ही हिसाब लगाइये ।
मेरे जेहन ने तो
काम करना बंद कर दिया है ।
शायद, विषैले प्रदूषण का
मेरे दिमाग पर असर हो गया है,
भोपाल की ही तरह ।

(भोपाल की गॅस-ट्रेजेडी पर आधारित,
पर्यावरण पर एक रचना । )

– सुभाष स. नाईक.

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